फतह सिंह उजाला 
पटौदी। गुरु पूर्णिमा पर्व के मौके पर वेद पुराणों के मर्मज्ञ, समाज सुधारक, चिंतक महामंडलेश्वर धर्मदेव महाराज ने संन्यास से पहले अपनी माता की दी हुई सीख / शिक्षा को याद किया। उन्होंने कहा मानव की पहली गुरु मां को ही माना गया है। जन्म लेने के बाद बालपन में सबसे अधिक ध्यान केवल और केवल मां  ही रखती है तथा अच्छे और बुरे का एहसास भी बालपन में माता के द्वारा ही करवाया जाता है । बुधवार को आषाढ़ माह की पूर्णिमा के मौके पर आश्रम हरी मंदिर पाटौदी परिसर में गुरु पूजा अर्थात गुरु पूर्णिमा पर्व श्रद्धापूर्वक और पारंपरिक तरीके से मनाया गया। ब्रह्म मुहूर्त में सूर्य उदय से पहले महामंडलेश्वर धर्मदेव महाराज ने आश्रम परिसर में ही अपने दादा गुरु ब्रह्मलीन अमरदेव महाराज और गुरु ब्रह्मलीन कृष्ण देव महाराज की प्रतिमा को पुष्पमाला अर्पित करते हुए नमन किया । इसी मौके पर श्रद्धालुओं की मौजूदगी के बीच वैदिक मंत्र उच्चारण के द्वारा दादा गुरु और गुरु को याद करते हुए सभी के मंगल की कामना की गई।

उन्होंने कहा मानव जीवन में पांच गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान देने वाले गुरु और उसकी भूमिका को बताया गया है । इस नश्वर संसार से केवल और केवल आध्यात्मिक गुरु ही व्यक्ति को अध्यात्म का ज्ञान देकर मुक्ति का मार्ग दिखाता है। महामंडलेश्वर धर्मदेव महाराज ने कहा गुरु बनाना सरल है , लेकिन गुरु बने रहना निश्चित रूप से जीवन पर्यंत एक चुनौती ही होता है। भारत देश को विश्व गुरु इसीलिए कहा जाता है, यहां के ऋषि मुनियों ने अपने अध्यात्म और कठोर तपस्या से जो ज्ञान प्राप्त किया। इस ज्ञान के माध्यम से दुनिया का मार्गदर्शन भी किया गया। गुरु कहलाना अथवा गुरु की पदवी, कांटो भरा मार्ग होने के साथ ही तलवार की धार जैसा भी है। परमपिता परमेश्वर के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति अथवा मानव की भूमिका उसके जन्म के साथ ही निर्धारित की गई है।

महामंडलेश्वर धर्मदेव महाराज ने आदि गुरु महर्षि वेदव्यास की चर्चा करते हुए कहा उनको सनातन में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। महर्षि वेदव्यास के द्वारा ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अर्थवेद के साथ ही महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना की गई। ऐसी भी मान्यता है कि इसी पावन तिथि अथवा पावन  दिवस पर आदि गुरु भगवान शिव के द्वारा सप्त ऋषियों को ब्रह्मांड का सर्वोच्च ज्ञान, शिक्षा अथवा उपदेश दिया गया । उन्होंने कहा गुरु शब्द बेशक से छोटा है, लेकिन इसका महत्व और व्याख्या बहुत ही बिस्तर लिए हुए हैं। सीधे और सरल शब्दों में गुरु की व्याख्या अंधकार से रोशनी की तरफ ले जाने वाले मार्गदर्शक के रूप में की जाती है ।

इसी मौके पर उन्होंने प्रमुखता से कहा की गुरु बनने की पहली सीढ़ी शिष्य ही होता है। शिष्य ही गुरु के बाद में गुरु के दिखाएं और बताएं मार्ग पर चलते हुए ज्ञान के द्वारा लोगों का मार्गदर्शन करता है । ब्रह्म मुहूर्त सूर्योदय के समय संस्था के आदि संस्थापक ब्रह्मलीन स्वामी अमरदेव और ब्रह्मलीन स्वामी कृष्ण देव को स्मरण किया जाने के मौके पर विशेष रूप से महामंडलेश्वर धर्मदेव महाराज के शिष्य अभिषेक सनातन, संजीव कपिल, तिलक राज, विजय शास्त्री, एडवोकेट सुरेंद्र धवन, वंश, तरुण मलिक, राजू पोपली सहित अन्य श्रद्धालु भी मौजूद रहे।