दीनबंधु राउत / रफ्तार मीडिया संवाददाता जामताड़ा 


ऑल इंडिया पसमंदा उलेमा बोर्ड ने मुहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े विवादों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि लोकतंत्र में कानून का शासन सर्वोपरि है, लेकिन इसके साथ-साथ हजारों विद्यार्थियों की शिक्षा और भविष्य की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बोर्ड ने कहा कि विश्वविद्यालय के संस्थापक एवं समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान से जुड़े भूमि अधिग्रहण, अतिक्रमण और अन्य मामलों की जांच विभिन्न एजेंसियों द्वारा की गई है तथा कई मामले न्यायालय में विचाराधीन हैं। ऐसे में अंतिम निर्णय न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में है। बोर्ड ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि यदि न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अनियमितता या अवैध कब्जा सिद्ध होता है, तो दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष और कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही प्रभावित लोगों को न्याय और उचित कानूनी राहत भी मिलनी चाहिए। हालांकि, बोर्ड ने यह भी कहा कि जौहर विश्वविद्यालय अब केवल किसी व्यक्ति से जुड़ा संस्थान नहीं, बल्कि हजारों विद्यार्थियों की शिक्षा का केंद्र बन चुका है। इसलिए किसी भी प्रशासनिक या कानूनी कार्रवाई से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए।बोर्ड ने सुझाव दिया कि आवश्यकता पड़ने पर उत्तर प्रदेश सरकार विश्वविद्यालय का अधिग्रहण कर उसे सरकारी या राज्य विश्वविद्यालय के रूप में संचालित करने जैसे संवैधानिक विकल्पों पर विचार कर सकती है। बोर्ड ने कहा कि किसी व्यक्ति की कथित गलतियों का दंड विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों को नहीं मिलना चाहिए। अंत में उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार से अपील की गई कि इस मामले में संवैधानिक मूल्यों, न्याय और शिक्षा तीनों के बीच संतुलन बनाते हुए निर्णय लिया जाए।