दीपचंद्र दीक्षित/अमृतपुर, फर्रुखाबाद। डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती के अवसर पर समाजवादी पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी अमृतपुर क्षेत्र में पूरी तरह सतह पर आ गई। एक ही पार्टी के दो प्रमुख नेताओं द्वारा अलग-अलग स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाने से न केवल सियासी हलचल तेज हुई है, बल्कि संगठन की एकजुटता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस घटनाक्रम ने स्थानीय राजनीति को गर्मा दिया है और आम जनता से लेकर कार्यकर्ताओं तक में चर्चा का माहौल बना हुआ है।
एक मंच पर डॉ. जितेंद्र यादव का आयोजन
पूर्व प्रत्याशी डॉ. जितेंद्र यादव ने अमृतपुर स्थित अंबेडकर प्रतिमा स्थल पर अपने समर्थकों के साथ पहुंचकर डॉ. भीमराव अंबेडकर को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान उन्होंने कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय नागरिकों को संबोधित करते हुए बाबा साहेब के आदर्शों—सामाजिक समानता, शिक्षा, अधिकार और न्याय—को अपनाने का संदेश दिया।
उन्होंने अपने संबोधन में संगठन को मजबूत बनाने और समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की बात कही। कार्यक्रम में मौजूद समर्थकों की अच्छी-खासी भीड़ ने यह संकेत दिया कि डॉ. यादव का क्षेत्र में प्रभाव अभी भी मजबूत बना हुआ है।
दूसरे खेमे में डॉ. नवल किशोर शाक्य का शक्ति प्रदर्शन
वहीं दूसरी ओर, सपा के वरिष्ठ नेता डॉ. नवल किशोर शाक्य ने दयानंद इंटर कॉलेज परिसर में समानांतर कार्यक्रम आयोजित कर अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया। उनके कार्यक्रम में भी बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और समर्थकों की मौजूदगी देखने को मिली।
इस आयोजन की विशेष बात यह रही कि सपा के प्रदेश सचिव मनोज मिश्रा मंच पर मौजूद रहे, जिसे शाक्य गुट की राजनीतिक पकड़ और संगठन में प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है। मंच से पार्टी की नीतियों और संगठन को मजबूत करने की बात कही गई, लेकिन दोनों कार्यक्रमों के अलग-अलग आयोजन ने कई सवाल खड़े कर दिए।
एक ही दिन, दो कार्यक्रम—संयोग या रणनीति?
एक ही पार्टी के दो बड़े नेताओं द्वारा एक ही अवसर पर अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करना अब सियासी बहस का विषय बन गया है। राजनीतिक जानकार इसे महज संयोग नहीं मान रहे, बल्कि इसे आगामी चुनावों से पहले अपनी-अपनी ताकत दिखाने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि पार्टी के नेता ही अलग-अलग मंचों पर बंटे नजर आएंगे, तो इसका संदेश कार्यकर्ताओं और जनता के बीच नकारात्मक जाएगा।
कार्यकर्ताओं में गहरी हुई दुविधा
इस घटनाक्रम का सबसे अधिक असर जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं पर पड़ा है। कई कार्यकर्ता खुलकर किसी एक गुट के समर्थन में सामने आने से बच रहे हैं। अंदरखाने यह चर्चा भी है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो संगठन को कमजोर होने से कोई नहीं रोक पाएगा।
कुछ कार्यकर्ताओं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वे असमंजस में हैं कि आखिर किस नेतृत्व को प्राथमिकता दी जाए।
संगठन की एकजुटता पर सवाल
दोनों कार्यक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर सपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। गुटबाजी की यह तस्वीर संगठन की एकजुटता को कमजोर कर सकती है। यदि समय रहते इस स्थिति को नहीं संभाला गया, तो इसका सीधा असर पार्टी के जनाधार पर पड़ सकता है।
आगामी चुनावों पर पड़ सकता है प्रभाव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की गुटबाजी आगामी चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है। एकजुटता की कमी का फायदा विपक्षी दल उठा सकते हैं, जिससे चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।
उच्च नेतृत्व की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
पूरे मामले पर अभी तक पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इससे कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस और गहरा गया है। अब देखना होगा कि पार्टी नेतृत्व इस स्थिति को कैसे संभालता है और क्या दोनों गुटों को एक मंच पर लाने में सफल हो पाता है या नहीं।
निष्कर्ष
अमृतपुर में अंबेडकर जयंती के अवसर पर सामने आई सपा की यह गुटबाजी आने वाले समय में जिले की राजनीति पर गहरा असर डाल सकती है। यह घटना न केवल संगठन के अंदरूनी हालात को उजागर करती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो पार्टी को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।