रफ्तार संवाददाता रंजीत पालकोट: पालकोट प्रखंड में बिजली विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर ग्रामीणों में लगातार असंतोष बढ़ता जा रहा है। क्षेत्र के विभिन्न गांवों में ट्रांसफॉर्मर खराब होने की स्थिति में उसे बदलवाने की जिम्मेदारी लगभग पूरी तरह ग्रामीणों के कंधों पर आ जाती है। विभागीय व्यवस्था होने के बावजूद ग्रामीणों को स्वयं चंदा एकत्र कर वाहन की व्यवस्था करनी पड़ती है और ट्रांसफॉर्मर लाने-ले जाने का पूरा खर्च उठाना पड़ता है। इससे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है तथा विभाग की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।ग्रामीणों का कहना है कि किसी गांव का ट्रांसफॉर्मर खराब हो जाने पर बिजली आपूर्ति कई दिनों तक बाधित रहती है। ऐसे में लोगों को बिजली संकट से राहत दिलाने के लिए गांव के स्तर पर चंदा किया जाता है। इस चंदे से वाहन किराया, ट्रांसफॉर्मर को उतारने-चढ़ाने का खर्च तथा संबंधित कार्यालय से नया ट्रांसफॉर्मर लाने में लगने वाले अन्य खर्चों का भुगतान किया जाता है। कई गांवों में प्रति परिवार 100 रुपये से लेकर 1500 रुपये तक चंदा लिया जाता है, ताकि जल्द से जल्द नया ट्रांसफॉर्मर लाकर बिजली बहाल की जा सके।
ग्रामीणों के अनुसार, खराब ट्रांसफॉर्मर को टीआरडब्ल्यू गुमला तक पहुंचाने और वहां से नया ट्रांसफॉर्मर लाने के लिए निजी वाहन किराये पर लेना पड़ता है। इसके अलावा ट्रांसफॉर्मर को वाहन पर लोड करने और उतारने के लिए मजदूरों की व्यवस्था भी ग्रामीणों को ही करनी पड़ती है। कई बार विभागीय कर्मचारियों की अनुपस्थिति या उदासीनता के कारण यह प्रक्रिया और अधिक कठिन हो जाती है।
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि बिजली उपभोक्ता नियमित रूप से बिजली बिल का भुगतान करते हैं। इसके बावजूद ट्रांसफॉर्मर बदलने जैसी मूलभूत व्यवस्था के लिए उन्हें अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ रहा है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब विभाग के पास ट्रांसफॉर्मर बदलने और रखरखाव की व्यवस्था मौजूद है, तो फिर उपभोक्ताओं को यह जिम्मेदारी क्यों निभानी पड़ रही है। उनका कहना है कि विभाग की ओर से समय पर पहल नहीं किए जाने के कारण ग्रामीणों को मजबूरी में स्वयं व्यवस्था करनी पड़ती है।कई ग्रामीणों ने बताया कि यदि वे स्वयं पहल नहीं करें तो खराब ट्रांसफॉर्मर को बदलने में कई दिनों या कई बार सप्ताहों का समय लग जाता है। इससे गांवों में पेयजल आपूर्ति, कृषि कार्य, छोटे व्यवसाय तथा विद्यार्थियों की पढ़ाई पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। गर्मी और बरसात के मौसम में बिजली नहीं रहने से लोगों की परेशानियां और बढ़ जाती हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि ट्रांसफॉर्मर बदलने की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने के बजाय विभाग अनौपचारिक रूप से लोगों को स्वयं व्यवस्था करने के लिए छोड़ देता है। यही कारण है कि गांव-गांव में चंदा कर ट्रांसफॉर्मर लाने की परंपरा जैसी स्थिति बन गई है। लोगों का कहना है कि यह व्यवस्था लंबे समय से चली आ रही है और अब इसे समाप्त करने की आवश्यकता है।सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का भी मानना है कि ट्रांसफॉर्मर बदलने की पूरी प्रक्रिया विभागीय स्तर पर संचालित होनी चाहिए। उपभोक्ताओं से बिजली बिल लेने के बाद ट्रांसफॉर्मर के परिवहन, स्थापना और रखरखाव का खर्च विभाग को वहन करना चाहिए। उन्होंने मांग की है कि खराब ट्रांसफॉर्मर को बदलने के लिए अलग से त्वरित कार्रवाई दल गठित किया जाए तथा गांवों में बिना किसी अतिरिक्त आर्थिक बोझ के समय पर बिजली आपूर्ति बहाल की जाए।ग्रामीणों ने जिला प्रशासन एवं बिजली विभाग के उच्च अधिकारियों से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि विभाग अपनी जिम्मेदारी का पूरी तरह निर्वहन करे तो उपभोक्ताओं को चंदा कर ट्रांसफॉर्मर लाने की मजबूरी नहीं होगी। साथ ही बिजली व्यवस्था में लोगों का विश्वास भी मजबूत होगा। फिलहाल पालकोट प्रखंड के अनेक ग्रामीण यही सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ट्रांसफॉर्मर बदलने की जिम्मेदारी विभाग की है या फिर ग्रामीणों की।