यूरोपीय संघ ने अमेरिका को लेकर एक बेहद सख्त और असाधारण चेतावनी दी है। EU के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि अगर अमेरिका जबरन ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करता है, तो यह नाटो के अंत की शुरुआत होगी। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा गठबंधनों में हलचल मचा दी है। EU का कहना है कि किसी भी नाटो सदस्य देश द्वारा दूसरे क्षेत्र पर बलपूर्वक कब्ज़ा न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा, बल्कि पश्चिमी सैन्य गठबंधन की बुनियाद को भी कमजोर कर देगा।
ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और डेनमार्क नाटो का प्रमुख सदस्य है। ऐसे में EU का तर्क है कि यदि अमेरिका जैसे ताकतवर नाटो सहयोगी द्वारा ग्रीनलैंड पर दबाव या सैन्य कार्रवाई की जाती है, तो यह नाटो के उस मूल सिद्धांत के खिलाफ होगा, जिसके तहत सदस्य देश एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करते हैं। EU अधिकारियों का कहना है कि नाटो की मजबूती आपसी भरोसे पर टिकी है और जब वही भरोसा टूटेगा, तो गठबंधन का अस्तित्व ही सवालों के घेरे में आ जाएगा।
EU के बयान में यह भी कहा गया है कि ग्रीनलैंड का मुद्दा केवल रणनीतिक या आर्थिक नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच ग्रीनलैंड का महत्व काफी बढ़ गया है। यहां प्राकृतिक संसाधनों, दुर्लभ खनिजों और सामरिक ठिकानों को लेकर वैश्विक शक्तियों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है। EU का मानना है कि किसी भी देश को बल प्रयोग के बजाय कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय नियमों के दायरे में रहकर ही अपने हित साधने चाहिए।
इस बयान को अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में बढ़ते तनाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। EU के रणनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका ने ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख अपनाया, तो इससे यूरोप में अमेरिका के प्रति भरोसा कमजोर होगा। कई यूरोपीय देशों में पहले से ही यह बहस चल रही है कि नाटो में अमेरिका की भूमिका कितनी संतुलित और भरोसेमंद है। ग्रीनलैंड जैसे मुद्दे इस बहस को और तेज कर सकते हैं।
EU ने साफ किया है कि वह डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संप्रभुता के साथ खड़ा रहेगा। बयान में यह भी कहा गया है कि किसी भी तरह की जबरदस्ती या सैन्य दबाव का सामूहिक रूप से राजनीतिक और कूटनीतिक विरोध किया जाएगा। EU का यह रुख बताता है कि वह नाटो के भीतर भी अपने हितों और सिद्धांतों पर समझौता करने के मूड में नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बयान नाटो के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। अगर सदस्य देशों के बीच ही अविश्वास बढ़ता है, तो रूस और चीन जैसी शक्तियों को इसका फायदा मिल सकता है। नाटो को लंबे समय से वैश्विक सुरक्षा का मजबूत स्तंभ माना जाता रहा है, लेकिन ऐसे विवाद उसके आंतरिक संतुलन को कमजोर कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, EU की यह चेतावनी केवल अमेरिका के लिए नहीं, बल्कि पूरे पश्चिमी गठबंधन के लिए एक संकेत है कि शक्ति प्रदर्शन के बजाय सहयोग और नियम-आधारित व्यवस्था ही नाटो को जीवित रख सकती है। अगर इस सिद्धांत से भटकाव हुआ, तो नाटो जैसा मजबूत सैन्य गठबंधन भी टूटने के कगार पर पहुंच सकता है।