पंजाब की सौ वर्ष या उससे अधिक आयु की महिलाओं के लिए भगवंत मान सरकार द्वारा ‘माँवां धीयां सत्कार योजना’ के तहत दी जा रही वित्तीय सहायता केवल आर्थिक मदद नहीं है। यह उनके जीवन की संध्या बेला में सम्मान, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का एक नया आधार है। इन महिलाओं में से कई चलने-फिरने में असमर्थ हैं , तो किसी को ठीक से सुनाई नहीं देता या कोई ठीक से बोल पाने में असमर्थ है। फिर भी, सौ वर्षों का पड़ाव पार कर चुकी ये महिलाएँ इस बात को भली-भाँति समझती हैं कि उन्हें मिलने वाली यह राशि उनकी अपनी है और वे इसे अपनी इच्छा के अनुसार ख़र्च कर सकती हैं। अपने इस अधिकार का एहसास ही उन्हें गहरा संतोष देता है।

कई लाभार्थियों ने बताया कि उन्हें इस योजना की जानकारी सबसे पहले अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों से मिली।वे इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहती थीं; इसलिए उन्होंने अपने बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों को मनाया, ताकि वे उनके साथ निकटतम आँगनवाड़ी केंद्र पहुँच कर आवश्यक औपचारिकताएँ पूरी कर सकें। उनके लिए यह सहायता इसलिए भी अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह उन्हें वृद्धावस्था या विधवा पेंशन के अतिरिक्त मिल रही है।

संगरूर की 109 वर्षीय भरपूर कौर ने अपनी पड़पोते की पत्नी की सहायता से आवेदन प्रक्रिया पूरी की और अब उसी की मदद से बैंक से राशि निकालती हैं। उन्होंने यह पैसा अपने बटुए में संभालकर रखा है।वे कहती हैं, “मैं इस पैसे का एक हिस्सा अपनी बेटियों पर ख़र्च करूँगी, जिनकी उम्र भी अब पचास वर्ष से अधिक है, और बाकी राशि से अपने लिए सुनने की मशीन खरीदूँगी। मुझे सुनने में कठिनाई होती है, लेकिन इसके अलावा मैं पूरी तरह स्वस्थ हूँ। आज भी घर का सारा काम स्वयं कर लेती हूँ। मुझे घुटनों का दर्द या कोई अन्य बीमारी नहीं है। आज तक किसी सरकार ने ऐसा काम नहीं किया।”

कोटकपूरा की 110 वर्षीय मुख्तियार कौर को भी योजना के तहत वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है। उन्हें सुनने में कठिनाई होती है, लेकिन वे बोलती स्पष्ट रूप से हैं और बताती हैं कि उन्होंने यह राशि घर-गृहस्थी की आवश्यकताओं पर ख़र्च की। वे कहती हैं, “मैंने पहले कभी किसी सरकार को पंजाब की महिलाओं को इतना सम्मान देते नहीं देखा।”

फरीदकोट की 102 वर्षीय जसमेल कौर ने अपना अधिकांश जीवन परिवार की देखभाल में बिताया है। उन्हें मिली सहायता राशि का उपयोग भी उन्होंने परिवार की भलाई के लिए ही किया। वे कहती हैं, “मैं कुछ पैसा आपनी दवाई-बूटी ते ख़र्च कीता ते कुछ पैसा आपने जवाई दे इलाज वास्ते आपनी बेटी नूँ दे दित्ता।(मैंने कुछ पैसे अपनी दवाइयों पर ख़र्च किए और कुछ पैसे अपने दामाद के इलाज के लिए अपनी बेटी को दिए।” मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा, “मुझे ख़ुशी है कि भगवंत मान सरकार महिलाओं का इतना ध्यान रख रही है।” वे कहती हैं, “इस उम्र में पैसा आपका सबसे बड़ा सहारा बन जाता है। हर काम के लिए इसकी ज़रूरत पड़ती है। अब तो साँस लेना भी कठिन लगता है।”

मोगा की 102 वर्षीय प्रीतम कौर बेहद कमज़ोर हैं और उन्हें सुनने में भी कठिनाई होती है। उम्र के कारण वह बहुत कम बोल पाती हैं, इसलिए उनके पुत्र सिकंदर सिंह बताते हैं कि 3,000 रुपये की इस सहायता ने उनकी माँ का जीवन कुछ आसान बना दिया है। परिवार ने इस राशि से उनके लिए एक व्हीलचेयर खरीदी, जिससे अब वे घर के भीतर आसानी से आ-जा सकती हैं। शेष राशि उनकी दवाइयों पर ख़र्च की गई। प्रीतम कौर के लिए यह सहायता उनके दैनिक जीवन को पहले की तुलना में अधिक सहज बनाने का माध्यम बनी है।

102 वर्षीय अंग्रेज कौर भी इस योजना से बेहद प्रसन्न हैं। उन्हें सुनने में कठिनाई होती है, लेकिन उनका उत्साह देखते ही बनता है। वह पूरे आत्मविश्वास से कहती हैं, “मैं ताँ आपने कोल रखाँगी एह पैसा, जित्थे दिल करेगा ओथे ही ख़र्च करांगी। (यह पैसा मैं अपने पास रखूँगी। जहाँ मेरा मन करेगा, वहीं इसे ख़र्च करूँगी।)” उन्होंने इस राशि से अपनी दवाइयाँ खरीदीं, अपने लिए नया सूट लिया और कुछ पैसे अपनी पोती पर भी ख़र्च किए। 102 वर्ष की आयु में भी उनका यह स्नेह और उदारता दूसरों के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है।

इन महिलाओं की बढ़ती उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएँ , शारीरिक सीमाएँ और विपरीत परिस्थितियों में भी उनका शांत धैर्य, ‘माँवां धीयां सत्कार योजना’ के महत्त्व को और अधिक बढ़ाता है। इन सौ वर्षों से अधिक आयु की महिलाओं के लिए यह वित्तीय सहायता केवल उनके बैंक ख़ाते में जमा होने वाली राशि नहीं है, बल्कि उनके गरिमापूर्ण जीवन को दिया गया सम्मान, आर्थिक आत्मनिर्भरता का संबल और इस बात का प्रमाण है कि समाज और सरकार की नज़र में आज भी उनका महत्त्व बना हुआ है। अपने शांत और प्रेरणादायक जीवन से ये महिलाएँ यह संदेश देती हैं कि सम्मान, गरिमा और अपने निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता जीवन के हर पड़ाव पर अनमोल होती है।