राजु मंडल /गांडेय। : आजादी के 78 साल गुजर जाने के बाद भी समाज के अंतिम पायदान पर खड़े परिवारों तक मुलभुत सुविधाएं से वंचित।
इसका जीता-जागता और भावुक कर देने वाला नजारा गांडेय प्रखंड के मैदनीसारे गाँव में देखने को मिल रहा है। यहाँ एक 80 साल की बुजुर्ग महिला इस उम्र में भी हाड़-तोड़ मेहनत कर, लोहा पीटकर अपने परिवार का गुजर-बसर करने को मजबूर है।
​मैदनीसारे पंचायत का यह कमार परिवार आज के आधुनिक युग में भी  रहने को लेकर सुविधाओं के लिए तरस रहा है। परिवार की मुखिया, पोखी कमार की पत्नी 80 वर्षीय दुखी देवी अपने तीन बेटों, बहुओं और पोता-पोतियों समेत कुल 14 सदस्यों का पेट पालने के लिए रोज सुबह से शाम तक हथौड़ा चलाती हैं और लोहा पीटने का पारंपरिक काम करती हैं। ढलती उम्र और कमजोर शरीर के बावजूद परिवार की जिम्मेदारी का बोझ उनके कंधों पर साफ देखा जा सकता है।

*​न जमीन, न मिला सरकारी आवास*

​पीड़ित परिवार ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि उनके पास न तो खेती के लिए और न ही रहने के लिए अपनी कोई जमीन है। वे सालों से जर्जर खपरैल के मकान में रहने को मजबूर हैं, जो कभी भी हादसे का सबब बन सकता है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि सरकार द्वारा गरीबों को पक्का मकान देने के बड़े-बड़े दावों के बावजूद, इस अत्यंत जरूरतमंद परिवार को आज तक किसी भी सरकारी आवास योजना जैसे अबुआ आवास या पीएम आवास का लाभ नहीं मिल सका है।

*​प्रशासनिक उदासीनता पर उठे सवाल*

​इस बेबस परिवार की स्थिति को देखकर स्थानीय ग्रामीणों में भी रोष है। ऐसे में जिला और प्रखंड प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा होता है कि आखिर सरकारी योजनाओं का लाभ देने वाले अधिकारियों की नजरें इस बेबस और लाचार परिवार पर अब तक क्यों नहीं पड़ीं।
इस अत्यंत गरीब कमार परिवार को उनका रहने जैसे सुविधाएं कब मिलेंगी, यह अब भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

वहीं बुजुर्ग पोखी कमार और उनके पत्नी दुखी देवी ने कहाँ हमारे पास न रहने को सही छत है और न ही कोई जमीन। इस उम्र में भी पेट की खातिर लोहा पीटना पड़ता है।
हमें रहने के लिए सरकारी घर नही मिला हैं.
हम बस उम्मीद में जी रहे हैं कि कभी सरकार की नजर हम पर भी पड. जाए।