बिद्युत महतो / रफ्तार मीडिया संवाददाता, ईचागढ़
सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल प्रखंड अंतर्गत हिरिमिली (दालग्राम) स्थित प्राचीन शिव मंदिर एक बार फिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन रहा है। वर्षों पुराने इस ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल का भव्य पुनर्निर्माण ग्रामीणों के जनसहयोग से कराया जा रहा है। गांव के लोग आर्थिक सहयोग के साथ-साथ श्रमदान कर मंदिर को आकर्षक स्वरूप देने में जुटे हैं। चांडिल प्रखंड प्रमुख रामकृष्ण महतो ने भी श्रद्धालुओं और क्षेत्रवासियों से मंदिर निर्माण में सहयोग करने की अपील करते हुए कहा कि यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का प्रतीक है।
ग्रामीणों के अनुसार, इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग का इतिहास कई दशक पुराना है। स्थानीय लोकमान्यता के मुताबिक पश्चिम बंगाल के कुछ लोग बैलगाड़ी पर शिवलिंग लेकर जा रहे थे। हिरिमिली गांव के समीप पहुंचने पर बैलगाड़ी का एक पहिया टूट गया। मरम्मत के लिए शिवलिंग को नीचे उतारा गया, लेकिन पहिया ठीक होने के बाद भी लाख प्रयासों के बावजूद शिवलिंग को दोबारा बैलगाड़ी पर नहीं चढ़ाया जा सका। ग्रामीणों का कहना है कि इसके बाद उन लोगों के साथ कई विचित्र घटनाएं घटीं, जिससे वे शिवलिंग को उसी स्थान पर छोड़कर लौट गए। तभी से भगवान भोलेनाथ का यह शिवलिंग यहीं विराजमान है और श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बाद के वर्षों में कई बार शिवलिंग को दूसरे स्थान पर स्थापित करने का प्रयास किया गया, लेकिन हर बार प्रयास विफल रहा। इसके बाद ग्रामीणों ने उसी स्थान पर पत्थर और मिट्टी से एक छोटा मंदिर बनाकर नियमित पूजा-अर्चना शुरू कर दी। समय के साथ यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई और यह स्थान क्षेत्र के प्रमुख शिवधाम के रूप में पहचान बनाने लगा।
ग्रामीणों के अनुसार, स्वर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना के तहत कैनाल निर्माण के दौरान मंदिर और शिवलिंग प्रस्तावित मार्ग में आ रहे थे। मंदिर को अन्यत्र स्थानांतरित करने की योजना बनी, लेकिन निर्माण कार्य के दौरान लगातार बाधाएं उत्पन्न होने लगीं और मशीनें बार-बार खराब होने लगीं। ग्रामीण इसे भगवान भोलेनाथ की कृपा और इच्छा मानते हैं। अंततः कैनाल का मार्ग बदल दिया गया और मंदिर को उसके मूल स्थान पर सुरक्षित रखा गया।
आज हिरिमिली का यह प्राचीन शिव मंदिर क्षेत्र की अटूट आस्था का प्रतीक माना जाता है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करने वालों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। सावन सहित पूरे वर्ष आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक और दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।