राजु मंडल रफ्तार मीडिया सवाददाता गांडेय

गांडेय प्रखंड के चरकमारा गांव के ग्रामीणों ने व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के खिलाफ एक मिसाल पेश की है। अंग्रेजों के जमाने से पगडंडियों के सहारे जीवन बसर करने को मजबूर इस गांव के लोगों ने आखिरकार खुद ही श्रमदान और आपसी चंदे के बल पर अपने लिए रास्ता बना लिया है।
​इस खबर से एक तरफ जहां ग्रामीणों के बुलंद हौसले और एकजुटता की सराहना हो रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के प्रति ग्रामीणों का आक्रोश भी खुलकर सामने आ गया है।
​आदिवासी व हरिजन बहुल इलाका,चरकमारा गांव में आदिवासी समाज और हरिजन समाज के लगभग 80 घरों की घनी आबादी निवास करती है।
​अंग्रेजों के जमाने की पगडंडियां,आज के आधुनिक युग में भी इस गांव के लोग मुख्य मार्ग तक पहुंचने के लिए वर्षों पुरानी और जर्जर पगडंडियों पर निर्भर थे।

*जिम्मेदारों की अनदेखी से टूटा भरोसा*

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने सड़क निर्माण के लिए जिला प्रशासन से लेकर क्षेत्र के विधायकों और तमाम जनप्रतिनिधियों तक कई बार गुहार लगाई और लिखित आवेदन दिए। लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ कोरे आश्वासन ही मिले। जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की बेरुखी से थक-हारकर आखिरकार ग्रामीणों ने खुद अपनी तकदीर लिखने का फैसला किया। सभी ने आपसी सहयोग से चंदा इकट्ठा किया और अपने दम पर रास्ते का निर्माण कर दिखाया।
​स्वयं रास्ता बनाने वाले ग्रामीणों में प्रशासन और क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों के प्रति भारी नाराजगी है। ग्रामीणों का कहना है कि वोट के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं जैसे सड़क के लिए भी उन्हें दशकों इंतजार करना पड़ा और अंततः खुद ही श्रम करना पड़ा।
​यह खबर गांडेय क्षेत्र के विकास के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है, साथ ही यह प्रशासनिक व जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के खिलाफ ग्रामीण जनता की मजबूत इच्छाशक्ति का एक बड़ा उदाहरण भी है।

मोके पर डॉ. पवन कुमार,सोना दास, जीतन दास, किशोर दास प्रदीप दास,कौशल्या देवी सिरजल हेमब्रोम समेत कई ग्रामीण मौजूद थे।