सौरभ राय/ रफ्तार मीडिया
रांची:केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित परिसीमन को लेकर झारखंड में राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है। जहां इंडिया गठबंधन के साथ विभिन्न दल परिसीमन का विरोध कर रहे हैं, वहीं भाजपा ने आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हुए पलटवार किया है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता मृत्युंजय शर्मा ने कहा कि परिसीमन संविधान द्वारा निर्धारित एक अनिवार्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जिसे राजनीतिक रंग देकर जनता को भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि कुछ राजनीतिक दल अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए परिसीमन को लेकर गलत धारणाएं फैला रहे हैं। जबकि यह प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक है और इसका उद्देश्य देश में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित एवं न्यायसंगत बनाना है।
*संविधान की भावना के अनुरूप है परिसीमन- मृत्युंजय*
मृत्युंजय शर्मा ने कहा कि संविधान की मूल भावना के अनुसार प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन किया जाना चाहिए, ताकि जनसंख्या में आए बदलाव के अनुरूप लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा प्रतिनिधित्व का पुनर्निर्धारण हो सके। उन्होंने कहा कि पिछले कई दशकों में देश के विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि की दर अलग-अलग रही है, जिसके कारण अनेक संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में व्यापक असमानता पैदा हो गई है।उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि प्रत्येक नागरिक के मत का समान महत्व हो। यदि किसी क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या अत्यधिक बढ़ जाए और दूसरे क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम रहे, तो प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित होता है। परिसीमन का उद्देश्य इसी असंतुलन को दूर करना है।
*दो बार स्थगित हो चुकी है प्रक्रिया*
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता ने जानकारी देते हुए बताया कि राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए परिसीमन की प्रक्रिया पहले ही दो बार 25-25 वर्षों के लिए स्थगित की जा चुकी है। ऐसे में अब संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना आवश्यक हो गया है, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था अधिक प्रभावी और न्यायपूर्ण बन सके।
*जनगणना से पहले ही फैलाया जा रहा भ्रम*
मृत्युंजय शर्मा ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि अभी देश में जनगणना की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई है और न ही उसके आधिकारिक आंकड़े सामने आए हैं। इसके बावजूद कुछ राजनीतिक दल और संगठन काल्पनिक आशंकाओं के आधार पर जनता के बीच भय और भ्रम का वातावरण बना रहे हैं।उन्होंने कहा कि बिना किसी आधिकारिक आंकड़े और तथ्यों के परिसीमन के संभावित प्रभावों को लेकर निष्कर्ष निकालना पूरी तरह गैर जिम्मेदाराना रवैया है। इससे लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होता है और जनता के बीच अनावश्यक भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।