कर्नाटक में घृणास्पद भाषण और नफरत से जुड़े अपराधों को रोकने के लिए तैयार “कर्नाटक हेट स्पीच और हेट क्राइम्स (रोकथाम और नियंत्रण) बिल, 2025” की मंज़ूरी को लेकर राजनीतिक सस्पेंस जारी है। यह बिल दिसंबर में विधानसभा और विधान परिषद दोनों में लोकसभा सत्र के दौरान पास किया गया था, लेकिन अब भी राज्यपाल के कार्यालय में पेंडिंग है और अभी तक उस पर सही‑सही निर्णय नहीं लिया गया है।
राज्यपाल थावर चंद गहलोत को यह बिल सरकार ने अनुमोदन के लिए भेजा था, लेकिन उन्होंने न तो इसे घृणास्पद भाषण बिल के रूप में मंज़ूरी दी है, और न ही इसे विधिवत सरकार को वापस भेजकर स्पष्टीकरण मांग लिया है। फिलहाल यह बिल उनके कार्यालय में ही रुका हुआ है और इसको लेकर राजनीतिक चर्चा तेज़ बनी हुई है।
कर्नाटक के गृह मंत्री जी. परमेश्वर ने इस विवाद के बीच बयान दिया कि राज्यपाल के रुख से बिल पर सस्पेंस कायम है, लेकिन उन्होंने कहा कि सरकार राज्यपाल के निर्णय और प्रक्रियाओं का सम्मान करती है और आगे की स्थिति का इंतज़ार करेगी। हालांकि जी. परमेश्वर ने यह स्पष्ट नहीं किया कि राज्यपाल ने बिल को कब तक मंज़ूर या अस्वीकार नहीं किया है, बस कहा गया है कि फिलहाल कोई आधिकारिक कार्रवाई नहीं हुई।
यह विवाद उस समय बढ़ गया जब बिल को लेकर विपक्षी पार्टियों जैसे भाजपा और जनता दल (Secular) ने राज्यपाल से अपील की थी कि वह इस विधेयक पर साइन न करें। उनकी माने तो यह बिल बोलने की आज़ादी पर अंकुश लगाने वाला है और आम जनता से लेकर पत्रकारों तथा विपक्षी आवाज़ों को सतर्क करने के बजाय मानवाधिकारों को कमजोर कर सकता है।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि बिल में “घृणास्पद भाषण” और “हेट क्राइम” की परिभाषा इतनी वृहद है कि यह सार्वजनिक आलोचना, विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक संवाद तक को अपराध की श्रेणी में ले सकता है। भाजपा सहित कुछ आलोचकों ने कहा कि यदि बिल को इसी रूप में लागू किया गया, तो यह लोकतांत्रिक ढांचे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा बन सकता है।
दूसरी ओर, सरकार समर्थक और कुछ सामाजिक समूहों का मानना है कि बिल का उद्देश्य सामाजिक सौहार्द और शांति बनाए रखना है, क्योंकि राज्य में कुछ समुदायों के खिलाफ ज़हरीली और नफरत भरी भाषा का प्रचार बढ़ा हुआ है। उनके अनुसार यह कानून कमजोर समूहों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी था।
कर्नाटक हेट स्पीच बिल उस समय काफी विवादित बन गया जब विपक्ष ने कहा कि इसे तेज़ी से और बिना पर्याप्त चर्चा के विधानसभा में पास किया गया। इसके बाद राजभवन तक विरोधी नेताओं ने पत्राचार और हस्तक्षेप की आवाज़ उठाई, लेकिन फिलहाल राज्यपाल ने बिल को स्थगित रखते हुए कोई स्पष्ट निर्णय सार्वजनिक नहीं किया है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इस बिल पर राज्यपाल के निर्णय को लेकर सस्पेंस के कारण राजनीतिक गलियारों में आगामी दिनों में और बयानबाज़ियाँ और बहसें हो सकती हैं, खासकर जब तक कि सरकार या राज्यपाल की ओर से मंज़ूरी या अस्वीकार की स्पष्ट घोषणा नहीं होती।