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CBFC सर्टिफिकेशन को लेकर ‘Jana Nayagan’ पर कानूनी घमासान, सुप्रीम कोर्ट में 15 जनवरी को संभावित सुनवाई

तमिल सिनेमा की बहुचर्चित फिल्म ‘जना नायकन’ (Jana Nayagan) को लेकर चल रहा CBFC विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच गया है। इस मामले में 15 जनवरी को शीर्ष अदालत में सुनवाई होने की संभावना जताई जा रही है। फिल्म के निर्माताओं ने सेंसर बोर्ड यानी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि CBFC ने बिना ठोस और स्पष्ट कारण बताए फिल्म के सर्टिफिकेशन में अनावश्यक देरी की और कुछ दृश्यों पर आपत्ति जताकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन किया।

‘जना नायकन’ को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब CBFC ने फिल्म में मौजूद कुछ राजनीतिक संवाद, कथानक और कथित संवेदनशील दृश्यों पर आपत्ति दर्ज की। बोर्ड का कहना है कि फिल्म का कंटेंट समाज के कुछ वर्गों में भ्रम या तनाव पैदा कर सकता है, जबकि मेकर्स का तर्क है कि फिल्म पूरी तरह से काल्पनिक है और इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल, व्यक्ति या संस्था को निशाना बनाना नहीं है। फिल्म निर्माता यह भी कह चुके हैं कि सिनेमा समाज का आईना होता है और रचनात्मक स्वतंत्रता पर इस तरह की रोक लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में यह मांग की गई है कि CBFC को फिल्म के सर्टिफिकेशन पर जल्द फैसला लेने का निर्देश दिया जाए, ताकि रिलीज में हो रही देरी से फिल्म और उससे जुड़े हजारों लोगों के हित प्रभावित न हों। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बार-बार की आपत्तियों और प्रक्रियात्मक देरी के कारण न सिर्फ आर्थिक नुकसान हो रहा है, बल्कि दर्शकों के फिल्म देखने के अधिकार पर भी असर पड़ रहा है। मेकर्स ने अदालत से यह भी कहा है कि सेंसर बोर्ड की भूमिका प्रमाणन तक सीमित होनी चाहिए, न कि कंटेंट को नियंत्रित करने तक।

इस बीच फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई संगठनों और कलाकारों ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी है। कई फिल्मकारों का मानना है कि अगर हर सामाजिक या राजनीतिक विषय पर बनी फिल्मों को इस तरह रोका जाएगा, तो रचनात्मक अभिव्यक्ति पर गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा। उनका कहना है कि CBFC को संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाकर काम करना चाहिए। वहीं, कुछ वर्गों का यह भी तर्क है कि समाज में शांति बनाए रखना बोर्ड की जिम्मेदारी है और अगर किसी कंटेंट से विवाद की आशंका हो, तो सावधानी बरतना जरूरी है।

कानूनी जानकारों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की संभावित सुनवाई इस मामले में एक अहम मिसाल बन सकती है। पहले भी कई मामलों में शीर्ष अदालत यह साफ कर चुकी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के तहत संरक्षित अधिकार है और उस पर केवल ठोस और वैध कारणों से ही रोक लगाई जा सकती है। अगर 15 जनवरी को इस मामले की सुनवाई होती है, तो कोर्ट CBFC की शक्तियों, उसकी कार्यप्रणाली और फिल्मों पर सेंसरशिप की सीमाओं को लेकर अहम टिप्पणियां कर सकता है।

कुल मिलाकर ‘जना नायकन’ का CBFC विवाद अब सिर्फ एक फिल्म तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह रचनात्मक स्वतंत्रता, सेंसरशिप और संवैधानिक अधिकारों की व्यापक बहस का हिस्सा बन चुका है। सभी की नजरें अब 15 जनवरी पर टिकी हैं, जब सुप्रीम कोर्ट की संभावित सुनवाई यह तय कर सकती है कि फिल्म को कब और किन शर्तों पर दर्शकों के सामने आने की अनुमति मिलेगी।

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