सरायकेला: सरायकेला‌ ओल्ड एज होम के निकट वन विभाग द्वारा निर्माणाधीन कार्यालय एवं स्टाफ भवन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। लाखों रुपये की लागत से बन रहे इस भवन के निर्माण कार्य में पारदर्शिता की कमी और विभागीय अधिकारियों की भूमिका को लेकर स्थानीय लोगों तथा मजदूरों ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं।आरोप है कि निर्माण स्थल पर न तो परियोजना से संबंधित कोई शिलापट्ट लगाया गया है और न ही निर्माण एजेंसी, लागत, प्राक्कलन अथवा टेंडर प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक की गई है। ऐसे में लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि निर्माण कार्य किन नियमों और प्रक्रियाओं के तहत कराया जा रहा है।स्थानीय लोगों का दावा है कि भवन निर्माण में मानक गुणवत्ता के बजाय स्टोन डस्ट का उपयोग किया जा रहा है, जिससे निर्माण की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। वहीं कुछ मजदूरों ने आरोप लगाया है कि उनसे प्रतिदिन लगभग आठ घंटे कार्य लिया जाता है, लेकिन उन्हें मात्र 300 रुपये प्रतिदिन मजदूरी दी जा रही है। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह निर्माण गुणवत्ता और श्रम कानूनों दोनों के उल्लंघन का मामला बन सकता है।सूत्रों के अनुसार निर्माण कार्य एक निजी ठेकेदार के माध्यम से कराया जा रहा है, जिसे विभागीय अधिकारियों का करीबी बताया जा रहा है। साथ ही यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि पूरे निर्माण कार्य की निगरानी सीधे रेंजर स्तर से की जा रही है। हालांकि इन आरोपों की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।मामले को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि निर्माण कार्य पूरी तरह नियमों के अनुरूप हो रहा है तो टेंडर, संवेदक, लागत और कार्य अवधि जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां सार्वजनिक क्यों नहीं की गईं? निर्माण स्थल पर सूचना पट्ट क्यों नहीं लगाया गया? और मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी मिलने संबंधी शिकायतों की जांच कौन करेगा?
इस संबंध में वन प्रमंडल पदाधिकारी (डीएफओ) से संपर्क किए जाने पर उन्होंने कहा कि स्थल का निरीक्षण करने के बाद ही किसी प्रकार की टिप्पणी करना उचित होगा।फिलहाल पूरे मामले पर लोगों की निगाहें विभागीय जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। यदि लगाए गए आरोपों में सच्चाई पाई जाती है तो यह मामला केवल निर्माण कार्य में अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विभागीय जवाबदेही और अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।