दिनेश कुमार रजक/रफ्तार मीडिया संवाददाता/मिहिजाम
चित्तरंजन रेलनगरी फतेहपुर स्थित प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में इस वर्ष आषाढ़ मास के पावन अवसर पर श्रद्धा, भक्ति और अनन्य आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। सन 1997 में नींव रखे गए इस ऐतिहासिक व भव्य मंदिर में वर्षों से चली आ रही जगन्नाथ रथयात्रा की पावन परंपरा को वर्ष 2026 में भी पूरी श्रद्धा, हर्षोल्लास और पवित्रता के साथ निभाया गया। विगत वर्षों में कोरोना काल के दौरान भी यह परंपरा विशेष सावधानियों के साथ जारी रखी गई थी। इस वर्ष भी अत्यंत भव्य पैमाने पर इस मेले और भव्य रथ यात्रा का आयोजन हुआ।
एक ही विशाल रथ पर विराजे तीनों विग्रह
इस वर्ष की रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता इसका भव्य स्वरूप रही। महाप्रभु की इस यात्रा को और भी विशेष व अलौकिक बनाने के लिए इस बार एक ही विशालकाय रथ तैयार किया गया। इसी मुख्य रथ पर भगवान जगन्नाथ, अग्रज बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा को एक साथ विराजमान कर भव्य नगर भ्रमण कराया गया। रथ को गेंदे के फूलों, रंग-बिरंगी दूधिया लाइटों और पारंपरिक आकर्षक कपड़ों से बेहद खूबसूरत ढंग से सजाया गया था। संध्या 7 बजे महाप्रभु का रथ मुख्य द्वार से बाहर निकला, पूरा वातावरण जय जगन्नाथ, हरे कृष्णा के जयकारों और ढोल-नगाड़ों की थाप से गुंजायमान हो उठा। श्रद्धालु प्रभु के दर्शन पाने और पुण्यदायी रथ की रस्सी को एक बार छूने व खींचने के लिए आतुर नजर आए।
पौराणिक संदर्भ: क्यों निकलती है रथयात्रा?
सनातन संस्कृति और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जगन्नाथ रथयात्रा का एक गहरा आध्यात्मिक और भावुक महत्व है।
कथा के अनुसार: एक बार भगवान जगन्नाथ की लाडली बहन सुभद्रा ने उनसे नगर द्वारका देखने की इच्छा प्रकट की थी। अपनी प्यारी बहन की इसी इच्छा को पूरा करने के लिए भगवान जगन्नाथ और भइया बलभद्र ने उन्हें एक भव्य रथ पर बिठाया और नगर भ्रमण पर निकल पड़े। वहीं एक अन्य मान्यता यह भी है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं और वहां कुछ दिन विश्राम करते हैं। यह यात्रा भक्तों के प्रति भगवान के अगाध प्रेम को दर्शाती है, जहां स्वयं नारायण गर्भगृह से निकलकर अपने भक्तों को दर्शन देने गलियों में आते हैं।
सुदूर क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालु, बच्चों का लघु रथ रहा आकर्षण का केंद्र
इस महाआयोजन में केवल फतेहपुर ही नहीं, बल्कि झारखंड और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों का भी हुजूम उमड़ पड़ा। मिहिजाम, चित्तरंजन, रूपनारायणपुर, होलूद कनाली, जामताड़ा समेत कई सुदूर ग्रामीण इलाकों से हजारों की संख्या में भक्त भगवान का आशीर्वाद लेने पहुंचे थे। यात्रा के दौरान जहां बड़ों में भारी उत्साह था, वहीं नन्हे-मुन्ने बच्चों द्वारा खींचा जा रहा छोटा रथ पूरी यात्रा में आकर्षण का केंद्र बना रहा। बच्चों की टोली अपने छोटे से रथ को खींचते हुए बेहद आनंदित नजर आ रहे थे।
महाभोग और आगामी 22 जुलाई को विशेष भंडारा
दोपहर के समय मंदिर परिसर में महाभोग प्रसाद वितरण का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने पूरी सुव्यवस्था के साथ लाइनों में लगकर महाप्रसाद ग्रहण किया।
उत्सव का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा है। आगामी 22 जुलाई को जगन्नाथ मंदिर प्रांगण में एक विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा, जहां हजारों श्रद्धालुओं को एक साथ बैठाकर पारंपरिक खिचड़ी भोग खिलाई जाएगी।
नीलचक्र कमिटी का सराहनीय योगदान
इस पूरे भव्य और विशाल आयोजन को अनुशासित व सफल बनाने में मंदिर की नीलचक्र कमिटी के सदस्यों की भूमिका बेहद सराहनीय रही। कमिटी के अध्यक्ष गोपबंधु श्यामल, सचिव भीमसेन साहू, एसएस प्रधान, बिपी नायक, पीसी नायक, प्रदीप साहू, एस के दिगल, भवानी सिन्हा, बैकुंठ साहू, जीतेन साहू, दिलीप साहू और संजय सामंतट्रे सहित दर्जनों कार्यकर्ताओं ने दिन-रात एक कर व्यवस्थाओं को संभाला। सफल आयोजन के बाद नीलचक्र कमिटी ने इस पावन यात्रा में सहयोग करने वाले प्रशासन, स्थानीय नागरिकों और दूर-दराज से आए सभी श्रद्धालुओं के प्रति सहृदय आभार व्यक्त किया है।