रफ्तार संवाददाता रंजीत पालकोट (गुमला)। ऐतिहासिक एवं धार्मिक नगरी पालकोट में भगवान जगन्नाथ की वार्षिक रथयात्रा को लेकर श्रद्धालुओं और क्षेत्रवासियों में भारी उत्साह देखा जा रहा है।ऋषिमुख पर्वत की तराई स्थित श्री अटलबली महाप्रभु जगन्नाथ मंदिर परिसर तथा आसपास के क्षेत्रों में रथयात्रा महोत्सव की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। 16 जुलाई को आयोजित होने वाली ऐतिहासिक रथयात्रा और मेले को लेकर बाजारों में रौनक बढ़ गई है। मेले में आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विभिन्न प्रकार की दुकानें सजने लगी हैं। साथ ही बच्चों और युवाओं के आकर्षण का केंद्र बनने वाले झूले, खिलौनों की दुकानें तथा मिठाइयों के स्टॉल भी लगाए जा रहे हैं।पालकोट की रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नागवंशी राजाओं की गौरवशाली परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक मानी जाती है।इतिहासकारों के अनुसार यह परंपरा सदियों पुरानी है, जिसे नागवंशी राजवंश ने आज तक जीवित रखा है। रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रहों की विशेष पूजा-अर्चना के बाद उन्हें भव्य रथ पर विराजमान कराया जाता है।
इस ऐतिहासिक आयोजन की सबसे विशेष बात यह है कि आज भी नागवंशी वंशज सपरिवार इस परंपरा का निर्वहन करते हैं। वर्तमान राजपरिवार के सदस्य भगवान के विग्रहों की पूजा-अर्चना कर उन्हें रथ पर स्थापित करते हैं और स्वयं अपने हाथों से रथ की रस्सी खींचकर यात्रा का शुभारंभ करते हैं। राजपरिवार इसे अपने कुल की मर्यादा, आस्था और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक मानता है।रथयात्रा में पालकोट प्रखंड के अलावा गुमला, सिमडेगा, रांची तथा आसपास के अनेक क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।प्रशासन और मंदिर समिति द्वारा भी श्रद्धालुओं की सुविधा एवं सुरक्षा को लेकर आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि पालकोट की रथयात्रा क्षेत्र की धार्मिक आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का अद्वितीय संगम है, जो हर वर्ष लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।