रफ्तार संवाददाता रंजीत पालकोट (गुमला)।
ऐतिहासिक, पारंपरिक एवं धार्मिक नगरी पालकोट में गुरुवार को भगवान जगन्नाथ प्रभु की भव्य रथयात्रा श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ संपन्न हुई। ऋषिमुख पर्वत की तराई में स्थित राजा मैदान में आयोजित इस ऐतिहासिक रथयात्रा में हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। पूरे क्षेत्र में जय जगन्नाथ के जयघोष, शंखध्वनि, घंट-घड़ियाल और ढोल-नगाड़ों की गूंज से भक्तिमय वातावरण बना रहा।पालकोट की यह रथयात्रा नागवंशी राजाओं की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक मानी जाती है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के अनुसार पालकोट राजपरिवार के सदस्य भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं देवी सुभद्रा के विग्रहों को विधि-विधान के साथ रथ में विराजमान कराते हैं। इसके बाद पालकोट के राजा स्वयं रथ की रस्सी पकड़कर रथ को खींचते हैं।इस दौरान श्रद्धालुओं में भी रथ की रस्सी पकड़ने की होड़ लगी रही, क्योंकि इसे अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।रथयात्रा में श्री जगन्नाथ मंदिर, अटलबली मंदिर तथा चौभूजी मंदिर के रथों को पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ नगर भ्रमण के लिए निकाला गया। मार्ग के दोनों ओर श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए घंटों खड़े रहे। महिलाओं, युवाओं और बच्चों ने भी बड़ी संख्या में भाग लेकर धार्मिक उत्सव को यादगार बना दिया।रथयात्रा के अवसर पर लगने वाला ऐतिहासिक मेला भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहा। मेले में पारंपरिक मिठाइयों विशेषकर गाजा और बालूशाही की दुकानों पर भारी भीड़ देखी गई। इसके अलावा झूले, मीना बाजार, खिलौनों की दुकानें, सजावटी वस्तुएं तथा मिनी सर्कस बच्चों और आगंतुकों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे। दूर-दराज के गांवों से पहुंचे लोगों ने खरीदारी के साथ मेले का भरपूर आनंद लिया।रथयात्रा को लेकर प्रशासन भी पूरी तरह मुस्तैद रहा।सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल की तैनाती की गई थी तथा मेले और रथ मार्ग पर लगातार निगरानी रखी जा रही थी।प्रशासनिक अधिकारियों ने भी कार्यक्रम स्थल का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया।रथयात्रा के दूसरे दिन से पालकोट स्थित चौभूजी मंदिर प्रांगण सह मौसीबाड़ी में भगवान जगन्नाथ के विभिन्न नव रूपों का विशेष श्रृंगार कर श्रद्धालुओं को दर्शन कराया जाएगा। इसे लेकर भक्तों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। पालकोट की यह ऐतिहासिक रथयात्रा एक बार फिर धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और नागवंशी परंपरा की जीवंत मिसाल बनकर उभरी।