मोतिहारी।ओमप्रकाश तिवारी
पूर्वी चंपारण के मोतिहारी में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति ने यह संदेश दिया कि आज भी महाराणा प्रताप केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि स्वाभिमान, राष्ट्रभक्ति, त्याग और संघर्ष के जीवंत प्रतीक हैं। समारोह में विभिन्न सामाजिक संगठनों, राजपूत समाज के प्रतिनिधियों, युवाओं, महिलाओं एवं बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने महाराणा प्रताप के जीवन, उनके आदर्शों और वर्तमान समाज की चुनौतियों पर विस्तार से अपने विचार रखे।
कार्यक्रम के दौरान यह बात प्रमुखता से सामने आई कि महाराणा प्रताप का जीवन केवल युद्ध और पराक्रम तक सीमित नहीं था। उनका संपूर्ण जीवन समाज, संस्कृति, धर्म, स्वाभिमान और जनकल्याण के लिए समर्पित था। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी कभी आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया। हल्दीघाटी के युद्ध के बाद भी उन्होंने संघर्ष जारी रखा और घास की रोटी खाकर भी स्वतंत्रता की रक्षा का संकल्प नहीं छोड़ा।
वक्ताओं ने कहा कि आज समाज में क्षत्रिय होने का अर्थ केवल जातीय पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वास्तविक क्षत्रिय वह है जो निर्बलों की रक्षा करे, अन्याय का विरोध करे, समाज को साथ लेकर चले और अपने कर्तव्यों का पालन करे। यदि समाज केवल अधिकारों की बात करेगा और कर्तव्यों को भूल जाएगा, तो महाराणा प्रताप के आदर्श अधूरे रह जाएंगे।
कार्यक्रम में गुरु-शिष्य परंपरा पर भी विशेष चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। महाराणा प्रताप के जीवन में भी उनके गुरुओं और मार्गदर्शकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इतिहास यह बताता है कि किसी भी महान योद्धा का निर्माण केवल उसकी तलवार नहीं करती, बल्कि उसके संस्कार, शिक्षा और मार्गदर्शन भी करते हैं। इसलिए समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जैसे सभी वर्गों के पारस्परिक सम्मान और सहयोग की परंपरा को मजबूत करना चाहिए।
वक्ताओं ने कहा कि इतिहास में अनेक अवसर ऐसे आए जब विभिन्न समाजों ने एक-दूसरे का सहयोग कर राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा की। यही भारत की सबसे बड़ी शक्ति रही है। यदि समाज आपसी सम्मान, सहयोग और समरसता बनाए रखे, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती।
महाराणा प्रताप और उनके सहयोगियों के संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उनके साथ अनेक वीरों, संतों, किसानों, जनजातीय समाज तथा विभिन्न वर्गों के लोगों ने मिलकर मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा की। यही कारण है कि महाराणा प्रताप आज पूरे भारत के नायक हैं, किसी एक समाज के नहीं।
कार्यक्रम में यह भी चिंता व्यक्त की गई कि आधुनिक समय में सामाजिक दायित्वों के प्रति लोगों की संवेदनशीलता कम होती जा रही है। पहले समाज के सक्षम लोग गरीब परिवारों की सहायता करते थे, बेटियों के विवाह में सहयोग करते थे, संकट के समय साथ खड़े रहते थे और सामाजिक नेतृत्व निभाते थे। आज आवश्यकता है कि उसी परंपरा को पुनर्जीवित किया जाए। महाराणा प्रताप की जयंती केवल माल्यार्पण और जयकारों तक सीमित न रहे, बल्कि उनके आदर्शों को व्यवहार में उतारा जाए।
युवाओं से आह्वान किया गया कि वे इतिहास को केवल सोशल मीडिया के माध्यम से नहीं, बल्कि प्रमाणिक पुस्तकों और ऐतिहासिक स्रोतों से पढ़ें। महाराणा प्रताप का जीवन त्याग, अनुशासन, राष्ट्रप्रेम, आत्मसम्मान और लोककल्याण की प्रेरणा देता है। यदि युवा इन मूल्यों को अपनाएंगे तो समाज और राष्ट्र दोनों मजबूत होंगे।
समारोह में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि समाज का उत्थान आपसी सम्मान, शिक्षा, संस्कार और सेवा से ही संभव है। किसी भी वर्ग या समुदाय का अपमान भारतीय संस्कृति की मूल भावना के विपरीत है। सभी वर्गों को मिलकर सामाजिक समरसता, राष्ट्रहित और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिए कार्य करना चाहिए।
अंत में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए यह संकल्प लिया गया कि उनके आदर्शों—स्वाभिमान, राष्ट्रभक्ति, न्याय, सेवा, त्याग और सामाजिक एकता—को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाएगा तथा समाज को संगठित एवं सशक्त बनाने की दिशा में निरंतर कार्य किया जाएगा।